देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है. सरकार इससे उबरने से ज्यादा भ्रमाने में लगी है. केंद्र के मंत्री मंदी के कारणों के लिए अजब-गजब तर्क दे रहे हैं. वित्त मंत्री हों या रेल मंत्री या श्रम और रोजगार मंत्री, मंदी की वजह गिनाने के लिए जो ज्ञान दे रहे हैं, वह लोगों के गले नहीं उतर रहा है. हालांकि सरकार के भक्तों को उनके यह तर्क जरूर रास आ रहे हैं. सरकार नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह की सरकारों पर हमले कर रही है. सरकार के निकम्मेपन को लेकर सोशल मीडिया पर भी खूब मजाक उड़ाया जा रहा है. जाहिर है कि सरकार विपक्ष के निशाने पर भी है.

राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी, ममता बनर्जी, उपेंद्र कुशवाहा तक सरकार पर हमलावर हैं. निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और संतोष गंगवार सरीखे केंद्रीय मंत्रियों के हाल ही में चर्चित बयानों का हवाला देते हुए अब पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि आर्थिक संकट से घिरी घरेलू अर्थव्यवस्था का ऐसे अटपटे बयानों से भला नहीं होगा. सिन्हा ने कहा कि सरकार में बैठे लोग अक्सर अटपटे बयान दे रहे हैं. इन अटपटे बयानों से अर्थव्यवस्था का कल्याण नहीं होगा. लेकिन इनसे सरकार की छवि पर असर जरूर पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि देश के ऑटोमोबाइल क्षेत्र की मंदी की पृष्ठभूमि में ओला और उबर जैसी ऑनलाइन टैक्सी सेवा प्रदाताओं को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के हालिया बयान पर उन्हें हैरत हुई. सिन्हा ने कहा कि अगर ओला-उबर जैसी कंपनियों की वजह से यात्री गाड़ियों की बिक्री में गिरावट आई, तो फिर दोपहिया वाहनों और ट्रकों की बिक्री में गिरावट क्यों आई. सिन्हा ने भाजपा के दो अन्य मंत्रियों के बयानों का उल्लेख करते हुए तंज किया कि बिहार के वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी कह रहे हैं कि सावन-भादो की वजह से देश में मंदी का माहौल है. केंद्र के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल आइंसटीन के गुरुत्वाकर्षण के नियम के बारे में बात कर रहे हैं. निर्यात को बढ़ावा देने के लिए दुबई शॉपिंग फेस्टिवल की तर्ज पर भारत में सालाना मेगा शॉपिंग फेस्टिवल आयोजित करने की सीतारमण की ताजा घोषणा पर भी पूर्व वित्त मंत्री ने सवाल उठाए. 

उन्होंने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात और भारत की अर्थव्यवस्थाओं के हालात अलग-अलग हैं. भारत की अर्थवस्था तभी बेहतर होगी, जब मध्यप्रदेश के मंदसौर जैसे इलाकों के किसान तरक्की करेंगे. सिन्हा ने यह भी कहा कि गुजरे सालों में समय रहते सुधार के कदम नहीं उठाए जाने से देश को मौजूदा आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि हमें कम से कम आठ फीसद की दर से विकास करना चाहिए था. लेकिन मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी विकास दर घटकर पांच फीसद पर आ गई. 

पूर्व वित्त मंत्री ने दावा किया कि जीडीपी विकास दर में तीन फीसद के इस अंतर से केवल एक तिमाही में देश की आमदनी में छह लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय की सरकार की नई योजना पर कहा कि मैं सरकारी बैंकों के विलय का विरोधी नहीं हूं. लेकिन बैंकों के विलय से इनके फंसे कर्जों (एनपीए) में अपने आप कमी नहीं आएगी. सरकार की मौजूदा योजना के कारण संबंधित बैंकों का प्रशासन अपने मूल काम छोड़कर विलय प्रक्रिया में लगा रहेगा जिससे इन संस्थाओं को नुकसान होगा. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).

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