CDS सरकार के रक्षा क्षेत्र हेतु सर्वोच्च एकल सलाहकार होगा। इसका प्रमुख कार्य रक्षा क्षेत्र की तीनों सेवाओं (वायु सेना, थल सेना, जल सेना) हेतु दीर्घकालीन नियोजन, रक्षा खरीद, प्रशिक्षण तथा अन्य संसाधनों के संदर्भ में समन्वय स्थापित करना होगा। युद्ध की प्रकृति में बदलाव आ रहा है अब युद्ध के पारंपरिक माध्यम विस्थापित हो रहे हैं, इसलिये तीनों सेवाओं के मध्य समन्वय स्थापित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसके अतिरिक्त, बजट एवं संसाधनों की सीमितता के चलते उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिये संयुक्त योजना एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता है और इसके लिये भी एकीकृत पद की आवश्यकता है जो इन सेवाओं में सहयोग स्थापित कर सके।

CDS का पद तीनो सेवाओं के मुख्य अधिकारी से बड़ा होगा, अतः संभावना व्यक्त की जा सकती है कि रक्षा खरीद में तेज़ी लाएगा और विभिन्न सेवाओं के मध्य संसाधनों की बर्बादी को रोकेगा। इसके साथ ही भारत एक परमाणु हथियार संपन्न देश है ऐसी स्थिति में CDS भारत के प्रधानमंत्री को सैन्य सलाह भी उपलब्ध कराएगा।

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अधिकांश देश जिनके पास बड़ा सैन्य बल है, ऐसे देशों में सेना प्रमुख को सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ अन्य दैनिक कार्यों की बागडोर नहीं दी गई है। भारत जैसे देश में ही ऐसी व्यवस्था बनी हुई है। CDS की नियुक्ति के पश्चात् इस विसंगति को दूर किया जा सकेगा।

CDS केवल सरकार के मुख्य रक्षा सलाहकार की ही भूमिका नहीं निभाएगा बल्कि रक्षा अधिग्रहण एवं सैन्य बलों से संबंधित विभिन्न मुद्दों को भी संबोधित करेगा। इसके अतिरिक्त CDS तीनों सेनाओं (जल सेना, थल सेना और वायु सेना) तथा उनके प्रमुखों के मध्य समन्वय स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। रक्षा क्षेत्र के लिये बजट आवंटन एवं विभिन्न योजनाओं के संदर्भ में भी CDS की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।

पृष्ठभूमि

भारत में पिछले दो दशकों से कई विभिन्न समितियों द्वारा CDS की नियुक्ति करने की सिफारिश की जाती रही है। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध के बाद सेना में सुधार के लिये गठित के. सुब्रमण्यम समिति ने सर्वप्रथम CDS पद की सिफारिश की थी। लेकिन इस मुद्दे पर सर्वसम्मति न होने तथा सेना द्वारा विरोध के पश्चात् इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सका।

वर्ष 2012 में गठित नरेश चंद्र समिति ने बीच का रास्ता खोजते हुए चीफ ऑफ़ स्टाफ समिति (COSC) के स्थायी अध्यक्ष की सिफारिश की थी। हालाँकि वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत अभी भी COSC के अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है किंतु इसके परिणाम आशानुरूप नहीं रहे हैं तथा आलोचकों का मानना है कि COSC का अध्यक्ष तीनों सेवाओं के प्रमुख अधिकारी में से सबसे वरिष्ठ को चुना जाता है तथा ये अध्यक्ष अपनी सेवा बफादारी की भावना से बाहर नहीं निकल पाते हैं।

सेना में सुधार के लिये गठित डी.बी. शेतकर समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर 2016 में सरकार को सौंपी। इस समिति द्वारा 99 सिफारिशें की गई थीं। इनमें से एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश CDS की नियुक्ति के संबंध में भी थी। सरकार द्वारा इस समिति की उपरोक्त में से 65 सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया।

अन्य देशों में व्यवस्था

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सभी बड़े देश विशेष रूप से परमाणु संपन्न देशों में CDS की व्यवस्था है। ध्यान देने योग्य है कि भारत के सैन्य बल तथा रक्षा मंत्रालय ब्रिटेन के मॉडल पर आधारित हैं। ब्रिटेन में रक्षा सचिव के समान एक स्थायी सचिव के साथ-साथ CDS के पद की भी व्यवस्था है। ब्रिटेन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, CDS ब्रिटेन के सैन्य बल का प्रमुख होता है तथा सभी सैन्य अभियान तथा कार्रवाइयों के लिये यही उत्तरदायी होता है। इसके अतिरिक्त CDS रक्षा मामलों में प्रधानमंत्री का सबसे वरिष्ठ सलाहकार होता है। स्थायी सचिव रक्षा मामलों के लिये सरकार का सबसे बड़ा असैन्य सलाहकार होता है तथा यह विभिन्न नीतियों, वित्त एवं नियोजन आदि के लिये भी उत्तरदायी होता है।

CDS की आवश्यकता क्यों?

आधुनिक युग में रक्षा क्षेत्र से संबंधित तकनीकी में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। अमेरिका, रूस एवं चीन इन बदलावों के साथ कदमताल कर रहे हैं। यह बदलाव न सिर्फ तकनीकी में बल्कि रक्षा क्षेत्र की तैयारियों में भी आया है। अब विश्व की प्रमुख शक्तियाँ परंपरागत सैन्य ढाँचे को छोड़कर एकीकरण की ओर बढ़ चुकी हैं। आरंभिक दौर में युद्ध ज़मीन एवं पानी में लड़े जाते थे, 20वीं एवं 21वीं सदी में वायु क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हो गया। मौजूदा समय में युद्ध तकनीक उपरोक्त तीन माध्यमों से भी आगे बढ़ चुकी है। साइबर युद्ध, अंतरिक्ष युद्ध जैसी नए युद्ध क्षेत्रों का विकास हुआ है। अमेरिका और चीन पहले ही अंतरिक्ष सैन्य कमांड बना चुके हैं। कुछ समय पूर्व भारत ने भी अंतरिक्ष कमांड के निर्माण की घोषणा की है। इन सबके बावजूद भारत की सेना अभी भी ब्रिटिशकालीन पारंपरिक ढाँचे से ही ग्रसित है, जबकि स्वयं ब्रिटेन ने समय के अनुरूप ज़रूरी बदलावों को अंजाम दिया है। ऐसी स्थिति में चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति न सिर्फ समय की मांग है बल्कि भारत के समक्ष उपजे खतरों से निटपने के लिये महत्त्वपूर्ण ज़रूरत भी। कुछ लोग इस पद को लेकर प्रकार की कई आशंकाएँ व्यक्त कर चुके हैं, जिन्हें संबोधित करना आवश्यक है। लेकिन कुछ आशंकाओं के आधार पर आवश्यक सुधारों को रोकना प्रगतिशील नहीं माना जा सकता।

चुनौतियाँ एवं सुझाव

वर्तमान में CDS की शक्तियों एवं कार्यों के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन ऐसा अनुमान लगाया गया है कि रक्षा सचिव एवं सैन्य अधिकारियों को मिलाकर एक समिति का गठन किया जाएगा। इस प्रकार की समिति के गठन को लेकर आशंका व्यक्त की जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बात विलक्षण है कि जिस विभाग की शक्तियों और कार्यों को कम किया जाना है उसका निर्धारण उसी विभाग द्वारा किया जाना एक अजीब स्थिति को जन्म दे सकता है। विश्व के अन्य देशों में क्रियान्वित रक्षा सुधारों के अनुभव से प्रतीत होता है कि इस प्रकार की समिति का अध्यक्ष किसी ऐसे व्यक्ति को बनाया जा सकता है जो रक्षा क्षेत्र से संबंधित न हों अर्थात् किसी राजनीतिज्ञ को समिति का अध्यक्ष नियुक्त करना भी एक अच्छा विचार हो सकता है।

किसी भी पुनर्गठन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू सैन्य और रक्षा मंत्रालय के बीच अंतर-संबंधों का होना चाहिये। इसके लिये क्षमता, विशेषज्ञता, निर्णय लेने की शक्तियों और ज़िम्मेदारियों तथा जवाबदेही को संरेखित करने पर ध्यान देने की ज़रूरत है। नौकरशाही और सेना के बीच संबंध रक्षा तंत्र में सबसे बड़ी समस्या रही है, इसको दूर करने के लिये दोनों ओर के विशेषज्ञों का होना आवश्यक है जो नागरिक एवं सैन्य दोनों मामलों की अच्छी समझ रखते हों।

इस बात पर काफी कुछ निर्भर करता है कि भारत का पहला CDS किसको नियुक्त किया जाएगा। इसके लिये सरकार को वरिष्ठता के स्थान पर सक्षमता एवं योग्यता को मापदंड बनाना चाहिये। विभिन्न सेवाओं की आशंकाओं और चिंताओं को देखते हुए किसी सेना के अधिकारी को इस पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिये यदि यह ज़रूरी हो तो किसी भूतपूर्व सेना प्रमुख की नियुक्ति अधिक उपयुक्त होगी। CDS रक्षा क्षेत्र में कई बदलावों जैसे- विभिन्न सेवाओं की आवश्यकता के अनुरूप उन्हें प्राथमिकता देना, दीर्घकालीन नियोजन पर ध्यान देना, अधिकारियों की शिक्षा और प्रशिक्षण (भारतीय राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय की स्थापना) आदि का वाहक बन सकता है। लेकिन यदि किसी योग्य अथवा ऐसा व्यक्ति जो अपनी सेवा के प्रति ही वफादार है या उसके पास ज़रूरी शक्तियों का अभाव है तो ऐसी स्थिति में CDS का महत्त्व एक और गौरवपूर्ण पद के अलावा अधिक नहीं रह जाएगा।

निष्कर्ष

भारत में प्रायः रक्षा सुधारों की वकालत की जाती रही है। लंबे वक्त से ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण सुधार चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति से संबंधित रहा है। पिछले दो दशकों से इस क्षेत्र में कई प्रयास किये गए किंतु अब जाकर सफलता मिल सकी है। वर्तमान परिदृश्य में वारफेयर में मौलिक बदलाव आया है, अब युद्ध की अवधि सीमित एवं तीव्रता अधिक होने लगी है तथा भविष्य में इसके और तीव्र होने की आशंका है। ऐसी स्थिति में भारत की सेनाओं के मध्य अधिक समन्वय एवं एकीकरण की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी। हालाँकि इस समस्या को हल करने के लिये चीफ ऑफ़ स्टाफ समिति (COSC) की नियुक्ति की जाती है किंतु इससे उचित परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। इस संदर्भ में CDS की नियुक्ति को I और अधिक बल मिला है। हालाँकि सिर्फ एक पद के u मा Iत्र से विभिन्न समस्याएँ अपने आप नहीं सुलझ जाएंगी, इसके लिये CDS के पद का सशक्त होना भी आवश्यक है। किंतु एक व्यक्ति जो सिर्फ नियुक्ति प्रक्रिया के माध्यम से CDS बन जाएगा तथा उसे अत्यधिक शक्ति भी प्राप्त होंगी, जो गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इन प्रश्नों का भी उत्तर सरकार को खोजना होगा ताकि CDS की शक्ति और उत्तरदायित्त्व में उचित संतुलन स्थापित किया जा सके तथा इस पद के माध्यम से रक्षा क्षेत्र में जिन सुधारों की उम्मीद की जा रही है उन्हें पूरा किया जा सके।

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