कुछ लोग इसके लिये तर्क देते हैं कि पुरुषों में ढलती उम्र के लक्षण महिलाओं की तुलना में देर से नजर आते हैं, जबकि महिलाएं जल्दी उम्रदराज नजर आने लगती हैं,ऐसे में उनकी उम्र कम होना ठीक है. लेकिन इस तर्क का कोई खास बायोलॉजिकल आधार नहीं है. बहुत से पुरुष वक्त के पहले ही उम्रदराज दिखने लगते हैं. पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है।

कुछ लोगों के अनुसार उम्र में अंतर होने से संबंधों में संतुलन होता है क्योंकि उम्र के साथ व्‍यक्ति की सोच विकसित होने लगती है, वह चीजों को अच्‍छे से समझता है और किसी चीज में संतुलन सही तरीके से बना सकता है. यदि दोनों की उम्र समान होगी तो लड़की लड़के को उस तरह का सम्मान नहीं देगी जैसा कि पति को मिलना चाहिये. ऐसे में दोनों के बीच अहम की लड़ाई शुरू हो जाएगी और लड़ाई- झगड़े अधिक होंगे उम्र का अंतर होने पर एक दूसरे का सम्मान और प्यार बना रहता है।

क्या कहता है हिन्दू धर्म-

कानूनी रूप से विवाह हेतु लड़की की उम्र 18 वर्ष और लड़के की उम्र 21 वर्ष नियुक्त की गई है, जोकि अनुचित है. बायोलॉजिकल रूप से लड़का या लड़की दोनों ही 18 वर्ष की उम्र में विवाह योग्य हो जाते हैं. कानून और परंपरा का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं।

हिन्दू दर्शन के मुताबिक आश्रम प्रणाली में विवाह की उम्र 25 वर्ष थी जिससे बेहतर स्वास्थ्य और कुपोषण की समस्या से छुटकारा मिलता था. ब्रह्मचर्य आश्रम में अपनी पढ़ाई पूर्ण करने के बाद ही व्यक्ति विवाह कर सकता था. आश्रम में पढ़ाई करने वाला व्यक्ति संस्कारवान होता है. आश्रम में लड़कियों और लड़कों दोनों के लिये शिक्षा की व्यवस्था थी. आश्रम में दाखिला लेने की अधिक से अधिक उम्र 7 से 8 वर्ष होती थी. आश्रम के अलावा लड़कियों के लिये घर या उसके आसपास ही कहीं शिक्षा की व्यवस्था होती थी. शिक्षा विज्ञान के अनुसार 25 साल की उम्र तक शरीर में वीर्य, विद्या, शक्ति और भक्ति का पर्याप्त संचय हो जाता है. इस संचय के आधार पर ही व्यक्ति गृहस्थ आश्रम की सभी छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को निभा पाने में सक्षम होता है।

उम्र में अंतर होने के मामले हिन्दू धर्म कोई खास हिदायत नहीं देता. लड़की की उम्र अधिक हो, समान हो या कि कम हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यदि दोनों की पढ़ाई अच्छे से संस्कारबद्ध हुई है तो दोनों में ही समझदारी होगी. यदि दोनों ही हिन्दू धर्म के बारे में नहीं जानते हैं और संस्कारवान नहीं है तो उनका विवाह मात्र एक समझौताभर ही रहेगा. यह समझौता कब तक कायम रहेगा यह नहीं कह सकते।

हालांकि वेदों को छोड़कर अन्य धर्मशास्त्रों अनुसार लड़की का विवाह रजस्वला होने के पूर्व ही हो जाना चाहिये. बाल विवाह का प्रचलन इसी धारणा के आधार पर हुआ होगा. वेदानुसार ऐसे व्यक्ति जो सही उम्र से पहले ही संभोग जैसे संबंधों में लिप्त हो जाते हैं उन्हें बुढ़ापा भी जल्द ही आ जाता है. उनका मानसिक विकास भी पर्याप्त नहीं हो पाता. प्रत्येक राज्य में विवाह की उम्र और प्रथा अलग-अलग है, लेकिन उक्त सभी का वेदों से कोई संबंध नहीं।

वेदों में स्त्री को पुरुष की सहचरणी, अर्धांगिनी और मित्र माना गया है. इस आधार पर उम्र का अंतर संतुलित होना जरूरी है. जैविक रूप से पुरुष अपनी उम्र से 2 वर्ष कम समझदार होते हैं जबकि महिलायें अपनी उम्र से 2 वर्ष अधिक समझदार होती हैं. अत: उम्र में अंतर रखने की सलाह दी जाती है. पारंपरिक रूप से पुरुष को घर का मुखिया माना जाता है और इसलिए उसे आदर देना आवश्यक होता है. जोड़ी की सामजिक स्वीकृति के लिए यह आवश्यक भी है. अपवाह को छोड़ दे तो प्राचीन काल से ही लड़के की उम्र लड़की से बड़ी होने को सही माना जाता है।


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