कल्चर डेस्क। भारतीय धर्म मे कई संस्कृतियों और मान्यताओं को माना जाता है। हमारी संस्कृति ऐसी संस्कृति है जिसमें कई सारें त्यौहार और कई सारें ऐसे कल्चर प्रोग्राम होते है जिनमें पूजा पाठ को बहुत ही उच्च लेवल पर रखा जाता है। इस पूजा पाठ में मौली का अहम स्थान होता है। किसी भी घार्मिक कार्य को करने से पहले मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। वैदिक परंपरा के अनुसार किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में पंडित जी यजमान को तिलक करते हैं और फिर मौली बांधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि मौली को पूजा करने से पहले बांधने का क्या कारण होता है। आपको बता दें कि मौली बांधना एक अहम रस्म होती है, और इसे बांधने का ये कारण होता है:-

पौराणिक मान्यता के अनुसार असुरों के राजा दानवीर की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इसी वजह से से रक्षा बंधन का प्रतीक भी मामना जाता है। देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए ये बंधन बांधा था।

धर्म शास्त्र के अनुसार मौली बांधते समय ब्राम्हण या पुरोहित अपने यजमान से यह कहता है की जिस तरह दानवों के पराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बंधे गए थे उसी सूत्र से में तुम्हे बांधता हूँ।


मौली बांधने से मन पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचारों का आगमन नही होता और वह गलत मार्ग पर नही जाता।


इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले मौली को बंाधा जाता है और इससे हमारें अंदर भी कई पॉजीटिव बातें होती है। इससे मन शांत और शुभ कार्य में मन लगा रहता है।

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