इंटरनेट डेस्क : हिंदू धर्म में सावन का महीना विशेष महत्व रखता है इस वर्ष सावन का पवित्र महीना 17 जुलाई से शुरु होने वाला सावन के इस खुशनुमा मौसम में भगवान शिव के देवलायों और मंदिरों में करोड़ों की तादाद में भक्त भगवान भोले के दर्शनों के लिए घंटों भीड़ में खड़े रहते है तो वही शिवभक्त सावन का महीना शुरु होते ही केसरिया रंग के कपड़ें पहनकर कावंड यात्रा भी निकाला करते है पिछले दो दशकों से कावड़ यात्रा की लोकप्रियता बढ़ी है और अब समाज में उच्च प्रशिक्षित लोग भी कावड़ यात्रा को निकालने के लिए तत्पर रहते है । लेकिन क्या आपको पता है की सावन के महीने में कावड़ यात्रा को निकालने वाले इस विशेष महत्व के बारे में।

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हिंदू धर्म में कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’का कावड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था। परशुराम, इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लेकर आए थे इसी परम्परा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग 'पुरा महादेव' का जलाभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है।

तो वही यह विशेष बात भी कावड़ यात्रा को लेकर जुड़ी हुई है पहले कावड़ यात्री श्रवण कुमार थे सर्वप्रथम त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कावड़ यात्रा की थी। माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र में गए जहां उनके अंधे माता-पिता ने उनसे मायापुरी यानि हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की। माता-पिता की इस इच्छा को पूरी करने के लिए श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया वापसी में अपने साथ गंगाजल लेकर गए तभी से कावड़ यात्रा का शुभारंभ हुआ।

तो यह भी मान्यता है की भगवान राम पहले कावडिया थे उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल भरकर, बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था।

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तो वही रावण से इस परंपरा की शुरुआत मानी जाती है पुराणों के अनुसार कावड यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया। शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों दूर करने के लिए अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने 'पुरा महादेव' स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का शुभारंभ हुआ और इस खास परंपरा को सावन के महीने में आज भी निभाया जाता है हमारे हिंदू धर्म में सावन के महीने का विशेष महत्व है ।

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