आज वैष्णो देवी में सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं, क्या आप उस समय का वर्णन कर सकते हैं जब ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी? ये परिवर्तन कब और कैसे आया?

ये वो समय था जब भारतीय रेल केवल पंजाब तक ही जाती थी |

तो हमारी यात्रा शुरू होती थी दिल्ली से पठानकोट तक जाने वाली ट्रेन से, जो कि अक्सर हमें दिन चढ़े पठानकोट पहुंचाती थी |

रात को ट्रेन में हम लोग सोते नहीं थे, क्योंकि भीड़ भरी ट्रेन में खिड़की के नज़दीक बैठ कर अँधेरे में ताकते रहने का भी एक अलग ही आनद होता था |रास्ते में पड़ने वाले हर ठहराव पर वो कुल्लड़ वाली चाय पीने का एक अलग ही मज़ा होता था |और यदि रेल में सीटें न मिलें तो दिल्ली से ही बस पकड़ लेते थे, लेकिन वो भी सीधे कटरा के लिए नहीं मिलती थीं |

वहां से जम्मू की बस से जम्मू तक और फिर वहां से कटरे की बस पकड़ कर कटरे तक |

इस प्रकार कनेक्टिंग यात्रा करके वैष्णो देवी पहुँचते थे, जहां पहुंचना आज इतना आसान हो चुका है कि आप लगभग ८ घंटों में ही सीधे दिल्ली से कटरा पहुँच सकते हैं, वो भी अतिआधुनिक ट्रेन में :

ये वो समय था जब सरकार ने वैष्णो देवी का राष्ट्रीयकरण नहीं किया था, वहां की सारी व्यवस्था स्थानीय पंडों के हाथ रहती थी |

आज के समान समतल रास्तों के स्थान पर कच्ची पथरीली पगडंडियां हुआ करती थी, जिनके बड़े-बड़े गोल और चिकने पत्थरों के बीच में लाठी फंसा कर चलना पड़ता था, क्योंकि यदि एक भी चिकने पत्थर पर आप फिसले तो स्वयं को लुड़कते जाओगे ही, साथ में दो-चार और को भी लेते जाओगे |

आज के मुख्य चौंक से, जहाँ ज्वेल्स और स्कूटर स्टैंड है, यहाँ से यात्रा शुरू हुआ करती थी, पुराने बाज़ार में से होते हुए ही चढ़ाई शुरू हो जाया करती थी |

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बाण गंगा तक, या शायद उस से थोड़ा और आगे तक, मार्ग के दोनों ओर दुकानों की भरमार होती थी, जहाँ आपको यात्रा से सम्बंधित ज़रूरी सामान मिलता था |

ये ज़रूरी सामान होता था :

टोर्च

बैटरी/सेल

बरसाती

कपडे के जूते

लाठी

चुन्नी

झंडे

ये वो दिन होते थे जब यात्रा की शुरुआत पर ही व्यक्ति चमड़े से बनी सभी चीज़ें छोड़ कर चलते थे, आजकल ऐसा केवल भवन में दर्शनों के समय किया जाता है |इसलिए जो लोग अपने साथ कपडे के जूते नहीं लाये होते थे, वे इन दुकानों से किराये पर ले सकते थे |

टोर्च, क्योंकि मार्ग पर कहीं कहीं ही इक्का-दुक्का रौशनी का साधन होता था |सेल/बैटरी क्योंकि टोर्च के अत्यधिक प्रयोग से एक सेट पूरा नहीं पड़ता था |

अधिकाँश सामान तो हम घर से ही ले कर चलते थे, लेकिन लाठियां अपने शरीर/कद-काठी के हिसाब से अवश्य वहीँ से ली जाती थी |

उस समय जम्मू में भी अधिक होटल नहीं हुआ करते थे, और कटरा में मात्र गिनती के ही, जिनके नाम भी याद नहीं हैं |मुख्यतः लोग विभिन्न धर्मशाला में ही रुका करते थे जहाँ मात्र एक कमरा उपलब्ध कराया जाता था |

उस ज़माने में एक बड़ा सा बिस्तर-बंद ले कर चलने का रिवाज़ होता था, जिसमें रज़ाई, तुलाई, और विभिन्न प्रकार की चादरें आदि ले कर चलते थे |

यात्रा करते समय, चाहे रेल की साधारण बर्थ हो, तब आज की भांति रेल की बर्थ पर गद्दे नहीं लगे होते थे, अथवा ऐसी धर्मशाला जिसमें केवल कमरा उपलब्ध कराया जाता था, ये बिस्तर-बंद सबसे अधिक काम की चीज़ होता था |

कटरे में अक्सर स्थानीय लोग अपने घरों में भी यात्रियों को ठहरा लेते थे, लेकिन इसकी आवश्यकता केवल रश के दिनों में ही होती थी, जो कि अमूमन बच्चों के स्कूलों में हुई गर्मियों की छुट्टियों का समय होता था |

थकावट इतनी होती थी, कि यदि शाम को आराम करने सोते थे, तो सीधे अगले दिन सुबह ही उठते थे |

यात्रा के लिए पूरी तरह से तैयार होने के बाद चढ़ाई करते हुए सबसे दयनीय हालत होती थी मार्ग में लाइन लगा कर बैठे हुए भिखारियों को देख कर | कोई कुष्ठ रोग से पीड़ित तो किसी का अंग-भंग, कोई अतिवृद्ध तो कोई अबोध बालक |

जहां आज गुलशन का लंगर चलता है, इस स्थान से भी आगे तक तो इनकी पंक्ति बिना टूटे बनी होती थी और अधिकाँश भिखारियों का स्थान भी फिक्स्ड होता था, पीछे आले बना कर अपने कपडे आदि भरे दिखते थे |

पिट्ठू सबसे अधिक ज़रूरी होता था, जो हमारा सामान (मुख्यतः कपडे आदि) को एक बड़ी सी चादर में बाँध पर अपने सर पर लटका कर चलते थे | आज भी दिखते हैं | केवल गठरियाँ नहीं दिखती हैं, अटैची और बैग अधिक दिखते हैं |

आज के सामान स्थान-स्थान पर खाना/पानी की सुविधा तो दूर, कहीं आराम करने की भी सुविधा नहीं होती थी |बस कहीं कहीं प्याऊ लगे होते थे जहाँ स्थानीय लोग पानी ले कर बैठे होते थे,

एक गिलास पानी पियो, वहीँ सामने रखे उबले काले चनों में से थोड़े से उठा कर खा लो, ५/१० पैसे रखो और चलते चलो

सबसे बड़ी कठिनाई होती थी, पक्के रास्तों का आभाव, उस पर भीड़ और उसी भीड़ में से गुज़रते घोड़े |

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हालांकि आवाज़ लगते चलते थे "पाड़ आले पासे हो जो" अर्थात "पहाड़ वाली तरफ हो जाओ", लेकिन इस से घोड़े पर बैठे लोगों की भी हालत पतली ही रहती थी |

खैर, किसी प्रकार ऊपर पहुँच जाओ तो सबसे पहले ये पता करना पड़ता था कि अभी कौन सा "ग्रुप नंबर" चल रहा है | आज के समान डिस्प्ले नहीं हुआ करते थे, बस कभी कभी लाउडस्पीकर पर अनाउंस कर दिया जाता था |

ग्रुप नंबर जानने के बाद अंदाजा लगाया जाता था कि हमारा नंबर कितने घंटों में आएगा?

यदि समय अधिक हो तो आराम भी कर सकते थे, आज की भांति ही कम्बल किराये पर लो और जहाँ जगह मिले बिछाओ भी और ओड़ो भी |

तब वहां केवल दो तहखाने हुआ करते थे, भवन पे, मिलिट्री एंट्री के सामने वाला शायद सबसे बड़ा था, वहां सीलन भरे अँधेरे में जगह ढूंढा सबसे मुश्किल काम होता था | नहीं तो फिर आज जहाँ श्राइन बोर्ड का कार्यालय और एटीएम है, उन गलियारों में ही सोना पड़ता था |और सोते हुए आपके पैरों को कोई भी कभी भी कुचल सकता था, और आप उसे कुछ नहीं कह सकते थे |

दो ग्रुप नंबर पहले ही सबको उठा दिया जाता था, और भवन पर प्राकृति झरने के पानी जो को नियंत्रित रूप से स्नानघरों में आता था (है) उस बर्फीले पानी से नहाना |

तब तो बड़े ही उत्साह से नहाते थे, आज सोच कर ही कंपकंपी आ जाती है |श्रद्धालु लोग आज भी वहीँ नहाते हैं |उसके बाद शुरू होता था सबसे मुश्किल काम, दर्शन !मुश्किल इसलिए क्योंकि भीड़ बहुत अधिक होती थी, आज जितनी तो नहीं, लेकिन व्यवस्था की कमी होती थी |

फिर वहां पर पण्डे जिन्हें "बारी दार" बोला जाता था, के किसी चमचे को पकड़ो, जो आपको दर्शन करवा दे |

प्रवेश इतना संकरा होता था, कि छोटे बच्चों को हाथ में ले कर अंदर प्रवेश ही नहीं हो पाटा था, इसलिए उन्हें उठाने का जिम्मा भी पण्डे अथवा उनके सहयोगियों को दिया जाता था |

आज भी कुछ अवसरों पर पुरानी गुफा से दर्शन करवा दिए जाते हैं, और प्रवेश द्वार से तो आप जाते ही हैं, इसलिए आसानी से देख सकते हैं कि कितना संकरा प्रवेश द्वार है, मात्र ३ फ़ीट के लगभग, उस पर प्रकाश का साधन मात्र कुछ बल्ब जो कि तारों के सहारे लटके हुए होते थे |

और भीतर दर्शन करने जाने और दर्शन के बाद बाहर आने के लिए यही एकमात्र रास्ता था |पैरों में बहता हुआ बर्फीला पानी, जिसमें कभी कोई कपड़ा(चुन्नी आदि) आपके पैर से टकरा जाता था |

इतनी कठिनाई से आप नज़दीक पहुँचते थे, तो पण्डे आपको आगे (वापस) धकेल देते थे |अधिकाँश ध्यान को अपने को संभालने और उस दुर्गम मार्ग से गुजरने में ही लगा होता था, आपने पहुँचते ही शीश झुकाया और बस लो जी, हो गए दर्शन, चलो, चलो, जल्दी से बाहर |

आप शायद यकीन नहीं करेंगें, अनेक वर्षों के बाद तो मुझे ये पता चला था कि गुफा में कोई मूर्ती ही नहीं है, अपितु हम पिण्डियों के दर्शन के लिए जाते हैं |

ये तो उसके बाद इस स्थान का राष्ट्रीयकरण हुआ तो स्थिति बेहतर होने लगी और आज तो पूर्णतः आरामदायक यात्रा बन चुकी है |

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