इंटरनेट डेस्क : हमारी हिंदू संस्कृति में हर तरह के पर्वों का अपना एक अलग ही महत्व होता है ऐसा ही कुछ शीतलाष्टमी के पर्व को लेकर भी है शीतलाष्टमी का पर्व होली के सम्पन्न होने के कुछ दिन बाद मनाया जाता है देवी शीतला की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से आरंभ होती है इस वर्ष ये पर्व 28 मार्च को है। शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला का पूजन किया जाता है । माता शीतला की पूजा के दिन से पहले कई तरह के पकवान हर घर में बनाए जाते है और अगले दिन ठंडी चीजों का भोग माता को लगाने के बाद हम स्वंय इन पकवानों को खाते है जिसे हम बसौडा कहते है। इस बासे खाने को हम बासे प्रसाद के रुप खाया करते है और यही बासा खाना हम प्रसाद के रुप में एक दूसरें के वितरित करते है।

घर मे टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करना होता है जीवन के लिए नुकसानदायक

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अगर इस दिन की विशेष कथा की बात की जाए तो स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना स्तोत्र को शीतलाष्टक के नाम से व्यक्त किया गया है हमारे हिंदू धर्म में मान्यता है कि शीतलाष्टक स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव जी ने लोक कल्याण हेतु की थी शीतला माता एक प्रमुख हिन्दू देवी के रूप में पूजी जाती है जो चेचक जैसे रोग कि देवी हैं, यह हाथों में कलश, सूप, मार्जन(झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं तथा गर्दभ की सवारी किए यह अभय मुद्रा में विराजमान हैं। इस दिन माता को खुश रखने के लिए बासी चीजों को भोग माता को लगाया जाता है। इस दिन कई लोग व्रत और उपवास भी करते है

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इस दिन पूरी श्रध्दाभाव से माता की पूजा करने से कई रोग भी दूर होते है जैसे ज्वर, चेचक, नेत्र विकार आदी। देवी शीतला की पूजा से पर्यावरण को स्वच्छ व सुरक्षित रखने की प्रेरणा प्राप्त होती है तथा ऋतु परिवर्तन होने के संकेत मौसम में कई प्रकार के बदलाव लाते हैं और इन बदलावों से बचने के लिए साफ सफाई का पूर्ण ध्यान रखना होता है हमारी हिंदू संस्कृति में इस दिन का एक विशेष महत्व है जिसको लेकर मां शीतला की पूजा करने से उनकी कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी।

तो इस वजह से महिलाएं पूजा-पाठ और धार्मिक जगहों पर ढकती है सिर

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