इंटरनेट डेस्क : रमजान का पावन पर्व चल रहा है और रमजान का ये पावन पर्व मुस्लिम समुदाय वर्ग के लोगों के जीवन में एक विशेष महत्व रखता है रमजान के 30वें रोजे के बाद ही ईद का चांद नजर आता है ईद के दिन खुशियोंभरा माहौल इन लोगों के बीच देखा जाता है इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग हिजरी कैलेंडर के अनुसार इस पर्व को मनाते है ईद का पर्व साल में दो बार मनाया जाता है एक है ईद-उल-फितर और दूसरा है ईद-उल-जुहा। ईद-उल-फितर मीठी ईद के नाम से जाना जाता है जो जल्द ही आने वाली है तो वही ईद-उल-जुहा बकरीद के नाम से जानी जाती है चांद दिखना के बाद ही ईद का त्योहार मनाय जाता है अब कई लोगों के मन में ये सवाल आता है की आखिर चांद दिखने के बाद ही ईद के त्योहार का ऐलान क्यो किया जाता है जिन इलाकों में चांद दिख जाएं तो वहां ईद का त्योहार पहले मनाया जाता है। इस बात से आपको अंदाजा लग जाएगा कि इस पर्व में चांद का नजर आना कितना महत्वपूर्ण है।

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हिजरी संवत के शव्वाल उल-मुकर्रम की पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। आसान शब्दों में कहा जाए तो ईद-उल-फितर या मीठी ईद का जश्न हिजरी कैलेंडर के दसवें महीने शव्वाल की पहली तारीख को मनाया जाता है

हिजरी कैलेंडर की उत्पत्ति का संबंध इस्लाम की एक मशहूर और ऐसिहासिक घटना के साथ हुआ इस घटना के मुताबिक हजरत मुहम्मद ने मक्का शहर से मदीना के लिए हिजरत की थी। हजरत मुहम्मद ने मक्का छोड़ने का फैसला करके अपने कदम मदीना के लिए बढ़ाए थे। शव्वाल का चांद देखने के बाद ईद का त्योहार मनाए जाने की परम्परा है ।

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हिजरी संवत चांद पर आधारित कैलेंडर है। इस कैलेंडर में हर महीने की शुरुआत नया चांद देखकर ही मनाया जाता है। यही वजह है कि जब तक रोजेदारों को शव्वाल महीने का चांद नहीं दिखाई देता है तब तक वो रमजान के महीने को मुकम्मल नहीं मानते हैं। बस इसी खास वजह से रमजान के आखिरी रोजे पर चांद दिखना महत्वपूर्ण माना गया है जो इन लोगों के जीवन में एक विशेष महत्व रखता है।

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