करवा चौथ स्पेशल : आखिर क्यों करती है छलनी से महिलाएं चांद का दीदार

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 कल्चरल डेस्क: करवा चौथ हमारी भारतीय संस्कृति में महिलाओं के जीवन में एक विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपनी पति कि लंबी उम्र के लिए कठिन उपवास रखती है। वह पति की लंबी उम्र के साथ अखंड सौभाग्य की कामना करती है।  कार्तिक मास में जब कृष्ण पक्ष आता है तो उसकी चतुर्थी को करवा चौथ मनाया जाता है। यह उपवास सुख ,सौभाग्य, और दांपत्य जीवन में विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव, पार्वती श्री गणेश और कार्तिकेय की पूजा की जाती है। चांद के दर्शन कर महिलाएं इस उपवास को खोलती है। चांद के दर्शन करते समय महिलाएं छलनी से चांद को देखती है। पर क्या आपको पता है कि महिलाएं छलनी से चांद को क्यों देखती है। क्या है छलनी से चांद देखने कि पौराणिक मान्यता।

तो चलिए जानते है कि इस दिन महिलाएं छलनी से चांद को क्यों देखती है…

करवाचौथ की कथा के मुताबिक एक बार किसी बहन को उसके भाइयों ने स्त्रेहवश भोजन करवाने के लिए छल से चांद की बजाय छलनी की ओट में दीपक दिखाकर भोजन करवा दिया था, जिससे उसका व्रत भंग हो गया। इसके बाद उसने पूरे साल चतुर्थी का व्रत किया। दोबारा करवाचौथ आने पर उसने विधिपूर्वक व्रत किया और उसे सौभाग्य की प्राप्ति हुई। इसके पीछे एक और रहस्य है कि कोई छल से उनका व्रत भंग न कर दें इसलिए छलनी के जरिए बहुत बारीकी से चंद्रमा को देखकर इस उपवास को खोला जाता है। महिलाओं के लिए यह खास त्यौहार एक विशेष महत्व रखता है। इस दिन

महिलाओं के लिए सरगी का भी विशेष महत्व है।  करवाचौथ का व्रत सरगी के बिना अधूरा माना जाता हैं। इसमें फल, सूखे मेवे और मिठाई होती है। महिलाएं सूर्योदय होने से पहले जो भोजन खाती हैं उसे सरगी कहते हैं । सरगी खाने के बाद महिलाएं पूरा दिन कुछ नही खाती हैं न कुछ पीती हैं । सुहागन औरतों को सरगी उनकी सास के द्वारा दी जाती है।

इसी के साथ करवा चौथ के नई नवेली दुल्हन के लिए मेहंदी लगाने का भी एक विशेष महत्व है। मेंहदी लगवाते समय महिलाएं अपने पति का नाम मेंहदी में लिखवाती है। मेंहदी के बिना महिलाओं का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। मेंहदी का रंग जितना गहरा आता है उसका पति उससे उतना ही प्यार करता है।

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